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Chhattisgarh

Socio-Economic Status of Chhattisgarh and Role of NGOs

Chhattisgarh, one of the states of India, came into existence after the partition of the Madhya-Pradesh in year 2000. It comprises of those districts of erstwhile Madhya-Pradesh where Chhattisgarhi is the most common language spoken by the residents of the state. As of now, the state is divided into sixteen districts. Chhattisgarh is one of the rich states with large amount of mineral resources such as iron ore, coal, bauxite, lime stone, dolomite and some others include diamond, tin ore, gold, base metals, graphite etc. The main sources of income for the large stratum of the population is agriculture and allied activities mainly horticulture and animal husbandry. Maize and rice are the major crops grown in the state and various pulses, millets and oilseeds, soya beans are grown in some parts of the state. The major section of industrial sector is steel industry, coal mining, production of aluminium, bauxite and mining of the other minerals and there purification.
The socio-economic status, as measured by human indices like literacy rate, provision of medical services is very poor especially in the rural and tribal areas. There is lack of availability of basic infrastructural facilities such as clean water for drinking, sanitation, shelter, telephone services, electricity and transport facilities in the rural areas of Chhattisgarh. The major population of Chhattisgarh is tribal and there standards of living are very poor. The fertility rate is very high in the rural population. The large portion of the labour class working in mines is suffering from life threatening aliments and not getting medical help from their employer companies. Large number of workers dies every year with the lack of health care facilities.
The population of lower stratum of Chhattisgarh is not aware of their health related issues, cleanliness and environmental conditions. Dealing with the health problems is the major issue for the tribals due to the lack of health care facilities and number of families every day bears the grief of separation of their loved ones due to unnatural deaths. In the tribal areas and rural areas education system has a bleak presence. In some of the tribal areas there are no schools at all. The tribal people are still struggling for their existence in society. They want to be respected by the people from the outer world. Their culture, traditional means of livelihood, their niche needs protection from the reoccurring attacks by profiteers of so called civilized world. They want to live fear free.
Many movements started by the left ideology organisations such as Naxlite movement and Maoists movements have found space in various aspects of the tribal lives. These movements in turn have made great effects on the lives of tribal people due to socio-economic reasons. According to one aspect, it has observed that due to the pressure built by the Maoists on the effective people of the stratum such as landlords, village heads, Money lenders, usurpers and the financiers, leads to building up of confidence and courage in the tribal people to speak out against their cruelties and to live a respectful life. This aspect also provides the basis of the ideological justification advanced by many intellectuals for the violence involved in these political movements. The areas affected by Naxalite and Maoist movement are in critical situation.
Apart from these movements a number of social change makers and volunteers are working to empower and uplift the underprivileged tribal and rural population of Chhattisgarh. Social change makers are working in various non-profit and non-governmental organisations to uplift the standards of living of tribal people. Various NGOs are involved in studying the tribal culture and the impacts that various environmental and socio-economic projects bear upon their lives. Chhattisgarh NGOs have also been working on the issues related to women health, education, overall empowerment and against the social evils that directly or indirectly works as a obstacle in the path of the tribal and rural development.

The condition of the women and the children are very poor and children of the tribes are prone to malnutrition. The health status of the under 5 years of age children are pathetic and their mortality rate is high, due to the lack of health facilities the rate of death of neonates and newborns is also high. Woman is fighting for her dignity and respect as she is facing obstacles every day and every time to prove that she is also a living being and having the right to fight for her own rights. Literacy rate is very low and poverty rate is very high and these are the basic factors responsible for the worst conditions of Chhattisgarhi people and also for the people of lower stratum in all over the country.
Non-governmental organisations are working for the child development and on the issues of child labour, child marriages, domestic violence against children. Illiteracy is another major issue as there is lack of availability of the educational bodies like government primary and secondary school. There is a lack of government concerns towards the basic needs of the tribal. Groups of volunteers go to teach the children of the tribal areas.
Still the conditions of the tribal’s demand more concerns and expect more dedicated work from the Chhattisgarh NGO for their upliftment. There is need to work on other related issues including the fulfilment of their livelihood requirements apart from environmental safety, protection of the natural resources, saving the girl child, health related legal rights etc. to uplift the underprivileged downtrodden section of Indian society.


छत्तीसगढ़ की सामाजिक आर्थिक स्तिथि और समाज सेवी संगठनों की भूमिका
छत्तीसगढ़, भारत के राज्यों में से एक है जो वर्ष 2000 में मध्य प्रदेश के विभाजन के बाद अस्तित्व में आया. इसमें तत्कालीन मध्य प्रदेश के वे जिले शामिल है, जहां छत्तीसगढ़ी राज्य के निवासियों द्वारा बोली जाने वाली सबसे आम भाषा है. अब तक, राज्य में सोलह जिले हैं. लौह अयस्क, कोयला, बॉक्साइट, चूना पत्थर, डोलोमाइट और कुछ अन्य जैसे हीरा, टिन अयस्क, सोना, आधार धातु, ग्रेफाइट आदि जैसे खनिज संसाधनों के साथ छत्तीसगढ़ समृद्ध राज्यों में से एक है. आबादी के बड़े हिस्से के लिए आय का मुख्य स्रोत कृषि और संबद्ध गतिविधियाँ हैं जिनमें औद्यानिकी और पशुपालन शामिल हैं. मक्का और चावल राज्य में उगाई जाने वाली प्रमुख फसलें हैं और विभिन्न दलहन, बाजरा और तिलहन, सोयाबीन राज्य के कुछ हिस्सों में उगाए जाते हैं. औद्योगिक क्षेत्र का प्रमुख क्षेत्र इस्पात उद्योग, कोयला खनन, एल्युमिनियम, बॉक्साइट और अन्य खनिजों का उत्पादन और शुद्धिकरण है.
सामाजिक-आर्थिक स्थिति- जैसा कि साक्षरता दर जैसे मानव सूचकांकों द्वारा मापा जाता है, विशेष रूप से ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में चिकित्सा सेवाओं का प्रावधान बहुत खराब है. छत्तीसगढ़ के स्वच्छ ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल, स्वच्छता, आश्रय, टेलीफोन सेवाओं, बिजली और परिवहन सुविधाओं जैसी बुनियादी ढांचागत सुविधाओं की उपलब्धता की कमी है. छत्तीसगढ़ की प्रमुख आबादी आदिवासी है और वहां लोगों का जीवन स्तर सामाजिक आर्थिक रूप से काफी ख़राब अवस्था में है. ग्रामीण आबादी में प्रजनन दर बहुत अधिक है. श्रमिक-वर्ग की कामकाजी खदानों का एक बड़ा हिस्सा खतरे-युक्त जीवन की स्तिथि में है और लोगों को उनकी नियोक्ता कंपनियों से चिकित्सा सहायता पर्याप्त नहीं मिल पाती है. स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं की कमी से हर साल बड़ी संख्या में श्रमिकों की मृत्यु हो जाती है.
छत्तीसगढ़ के अधिकांश जनजाति के लोग उनके स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों, स्वच्छता और पर्यावरण की स्थिति से अवगत नहीं है. स्वास्थ्य देखभाल की सुविधाओं की कमी और हर दिन अप्राकृतिक मौतों के कारण अपने प्रियजनों से दु: ख के अलगाव के कारण स्वास्थ्य समस्याओं से निपटना आदिवासियों के लिए एक प्रमुख मुद्दा है. जनजातीय क्षेत्रों और ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा प्रणाली की धूमिल स्थिति है. कुछ आदिवासी इलाकों में तो बिल्कुल भी स्कूल नहीं हैं. आदिवासी लोग अभी भी समाज में अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं. वे अपने क्षेत्र के बाहरी लोगों से सम्मानजनक मान्यता की अपेक्षा रखते हैं. उनकी संस्कृति, आजीविका के पारंपरिक साधन, उनके अस्तित्व को तथाकथित सभ्य दुनिया के मुनाफाखोरों द्वारा किए गए हमलों से सुरक्षा की आवश्यकता महसूस की जा रही है. वे डर से मुक्त होकर जीना चाहते हैं.
वामपंथी विचारधारा के संगठनों द्वारा शुरू किए गए कई आंदोलनों जैसे कि नक्सली आंदोलन और माओवादी आंदोलनों ने आदिवासी जीवन के विभिन्न पहलुओं को पाया है. इन आंदोलनों ने सामाजिक-आर्थिक कारणों से आदिवासी लोगों के जीवन पर बहुत प्रभाव डाला है. एक पक्ष के अनुसार यह देखा गया है कि माओवादियों आन्दोलन के कारण वहां के जमींदारों, ग्राम प्रधानों, धन उधारदाताओं, सूदखोरों और फाइनेंसरों पर एक विशेष दबाव बना है, इस कारण उन प्रभावशालियों की क्रूरताओं से होने वाली ज्यादती के खिलाफ आदिवासी लोगों में बोलने में सम्मानजनक जीवन जीने के लिहाज से आत्मविश्वास और साहस आया है. यह पहलू इन राजनीतिक आंदोलनों से जुड़ी हिंसा के लिए कई बुद्धिजीवियों द्वारा उन्नत वैचारिक औचित्य का आधार भी प्रदान करता है. नक्सली और माओवादी आंदोलनों से प्रभावित क्षेत्र गंभीर हालत में हैं.
इसके अलावा, कई सामाजिक परिवर्तनकारी संगठन और स्वयंसेवक छत्तीसगढ़ की वंचित आदिवासी और ग्रामीण आबादी को सशक्त करने और उनके उत्थान के लिए काम कर रहे हैं. सामाजिक परिवर्तनकारी विभिन्न गैर-लाभकारी और गैर-सरकारी संगठनों के जरिए आदिवासी लोगों में के जीवन स्तर को ऊपर उठाने के लिए काम कर रहे हैं. विभिन्न एनजीओ आदिवासी संस्कृति और सामाजिक विकास के लिए कार्यरत हैं, इसके लिए संचालित की गई विभिन्न पर्यावरणीय और सामाजिक-आर्थिक परियोजनाओं से उनके जीवन पर कुछ असर हुआ है. छत्तीसगढ़ के एनजीओ महिलाओं के स्वास्थ्य, शिक्षा, समग्र सशक्तिकरण और आदिवासी और ग्रामीण विकास की बाधा में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से काम करने वाली सामाजिक बुराइयों के खिलाफ भी काम कर रहे हैं.

महिलाओं और बच्चों की स्थिति बहुत खराब है और जनजाति समुदाय के कई बच्चे कुपोषण से ग्रस्त हैं. 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों की स्वास्थ्य स्थिति दयनीय देखी गई है और उनकी मृत्यु दर उच्च है. स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण नवजात शिशुओं की मृत्यु की दर भी अधिक है. महिलाएं अपनी गरिमा और सम्मान के लिए लड़ रही है, वे अपना सम्मानजनक अस्तित्व साबित करने के लिए हर समय बाधाओं का सामना करती है और अपने अधिकारों के लिए लड़ने का अधिकार रखती है. साक्षरता दर बहुत कम है और गरीबी की दर बहुत अधिक है और ये मूल कारक हैं जो छत्तीसगढ़ी लोगों की बुरी परिस्थितियों के साथ-साथ देश के लोगों के भी कमजोर सामाजिक आर्थिक स्तर के लिए जिम्मेदार हैं.
गैर-सरकारी संगठन बच्चों के विकास और बाल श्रम, बाल विवाह, बच्चों के खिलाफ घरेलू हिंसा के मुद्दों के लिए काम कर रहे हैं. निरक्षरता एक अन्य प्रमुख मुद्दा है क्योंकि सरकारी प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों जैसे शैक्षिक निकायों की उपलब्धता में कमी है. आदिवासी समुदाय की बुनियादी जरूरतों के प्रति सरकार की पर्याप्त योजनाओं की कमी देखी गई है. सामाजिक कार्यकर्ताओं के समूह आदिवासी क्षेत्रों के बच्चों को पढ़ाने जाते हैं.
आदिवासी समुदाय की विकास के प्रति आवश्यकता और स्थिति को देखते हुए उनके उत्थान के लिए छत्तीसगढ़ में एनजीओ से अधिक समर्पित कार्य की अपेक्षा है. पर्यावरण संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा, बालिकाओं को बचाने, स्वास्थ्य संबंधी कानूनी अधिकारों आदि के अलावा भारतीय समाज के वंचित दलित तबके की आजीविका की आवश्यकताओं की पूर्ति सहित अन्य संबंधित मुद्दों पर काम करने की आवश्यकता है.


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NGO – Trust or Society

Non-Governmental Organisation (NGO) or Non Profit Organisation (NPO) can be registered by many registration processes in India like Society, Company, Trust or any valid formation but status of the registered organisation is equal and equally recognised as NGO (Non Governmental Organisation /Non-Profit Organisation).

Registration process of NGO under Indian Trust Act, Society Registration Act, Company Registration Act or any other act/ law are different but the status of the registered organisation is equal as NGO. There is no difference in the status of NGO to get funding from Central/State Government Departments/ Ministries, Foreign funding agencies, Indian funding agencies, companies for Corporate social responsibility, individuals or any support agencies.
NGO registered through any process/ act can get registered under Income Tax Act, Foreign Currency Regulation Act (FCRA) or any kind of registration with any Government requirement. Every registered NGO are not eligible for the registration under various departments’ registration. The NGO must fulfill the registration process and parameters as required by the concerned department or authority. But the basic registration parameters do not matter that by which act the Voluntary Organisation is registered as NGO.

Just check here the comparison, difference and similarity between Trust, Society and Non Profit Company: Trust, Society and Company.
So now question is that how to register and under which act you have to register NGO? What kind of NGO is suitable to operate and manage? For answer and solution you can discuss with NGO Consultants at NGOsIndia.net